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नारीवादी

नारीवादी पर एक काव्यात्मक कविता।

Sameer raj 18 अगस्त 2026 1 मिनट पठन
नारीवादी
क्या मैं सच में नारीवादी हूँ? बाते तो करता हूं ऊँची-ऊँची, पर उन मुद्दों से भागता हूँ, जहाँ बिकती है देह व्यापार, वहाँ खामोश हो जाता हूँ। जहाँ लगती जिस्मों पर बोली, जहाँ इंसानियत भी खो जाती है, वहाँ से मैं नज़रें चुराकर मन को सही बतलाता हूँ। मेरा भी मन करता मैं करूँ विरोध, पर समाज का डर मेरे दिल में है, यही कि तुम तो मर्द हो, क्यों वैश्याओं की बाते करते हो, हम समाज के मुखिया है, फिर भी हर समय करते हो वेश्याओं की बात? क्यों करते हो उनकी बातें, जिनको समाज में भी जगह नहीं,
पर मन में प्रश्न उठता मेरे कि "क्यों नहीं दी जाती उनको समाज में जगह, क्यों आखिर नारी को सिर्फ वैश्याओं से जोड़ा जाता है?"
"ना वो तो कोई जानवर, ना ही वो कोई अलग प्राणी है, है! उनकी भी तो कोई इज्जत और उनकी भी कोई कहानी है।
समाज फिर पूछता है मुझसे "शायद तुम पर कोई तंत्र हुआ है क्या, जो इतना तुम खुद को नारीवादी बतलाते हो?"
अरे मूर्खों! इंसानियत तो तभी मर गई थी, जब किसी के घर की बेटी निर्वस्त्र हो गई। लज्जा है उस समाज पर जिसने इंसानों में भी भेद किया, पहले क्यों छीनी उन स्त्रियों की खुशी, और क्यों उसे ही दोषी ठहराया।
इस कविता में बस इतना कहना चाहता हूं उठाकर फायदा उसकी मजबूरी का, क्या तुम भी खुद को नारीवादी बतलाते हो?"
Student
Sameer raj

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