
कुछ लिखकर लाया हूँ
कुछ लिखना चाहूंगा,
ज्ञान के इस मंदिर में,
मैं कुछ सीखना चाहूंगा।
वक्त की सिलवटों से,
पन्नों पर दिखना चाहूंगा,
सिखलाहट की बात,
मैं लिखना चाहूंगा।
आप इस कृति के लेखक हो,
इस लेखन में,
मैं भी दिखाना चाहूंगा,
ज्ञान के चित्रों पर जब
रंग उकेरा जाएगा,
उन रंगों में मैं भी रंगना चाहूंगा।
कुछ लिखकर लाया हूँ
कुछ लिखना चाहूंगा,
ज्ञान के इस मंदिर में
मैं कुछ सीखना चाहूंगा।
जीवन के इस मोड़ से,
आयाम नए मिल जाएंगे।
सोचता हूँ,
क्या आपके जैसे
कभी हम भी बन पाएंगे,
रहेगी कोशिश पूरी हमारी
जहां भी रहे,
आसमान में छा जाएंगे,
आपके इस साथ से,
आपके हर प्रयास से,
कुछ लिखकर लाया हूँ
कुछ लिखना चाहूंगा,
ज्ञान के इस मंदिर में,
मैं कुछ सीखना चाहूंगा।


