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बचपन का आशियाना
यह कविता बचपन के घर के ऊपर है जिसमें बचपन के घर को एक आशियाने के रूप में संजोया गया है

परिंदों का झुंड
गांव को छोड़ चुका है
आधुनिकता के अपार्टमेंट में
एक कमरे के भीतर
जिंदगी सिमट गई है
वह घर,
जिसमें एक खिड़की थी,
उस खिड़की से पंछियों का
घोंसला दिखाई पड़ता था।
कोयल के मधुर स्वर में
पूरी प्रकृति गूंज उठती थी।
बचपन का मैदान और बगीचा
यही घर होता था।
दादी के साथ
घर ने दोस्ती कर ली है
ताऊं और चाचा ने
अपना बसेरा अलग कर लिया है,
शहर से यहां आना
खुद को इस आशियाने में
अजनबी महसूस कराता है
इस आशियाना ने
मौसम की मार को सहा है
दीवार भी जर्जर हो गई है
पर यह घर आज भी
वही पुरानी छांव देता है।
छुट्टियों के इंतजार में
यह घर बरगद बनकर
परिवार की डालियों को
अपनी जड़ों से जोड़कर रखता है।
बचपन का आशियाना
अब मकान बन गया है
शहर की आपाधापी में
पेड़ों के पत्तों की सरसराहट
स्मृति बनकर मन में समा गई है।


