
सुन इश्क़! मैं तुझे लिख रहा हूँ
अपने अश्क़ो के कतरों से।
तुझे मैं सींचना चाहता हूँ
मोहब्बत के बगीचे में।
इतनी छांव देना कि तुझे अपने
लहू में उतार पाऊं।
धमनियों में
तुम्हारा ही जिक्र होता है,
हर सांस तुम्हारी,
खुशबू के साथ घुलना चाहती है।
इतनी आवारगी मुझमें
शेष नहीं है कि,
तुम्हें अपना शेष कुछ भी दे पाऊं।
तुम्हारी नर्मी अब भी,
दिल को सुकून देती है
बरसात से भी पहले,
तुम्हारी हँसी मुझे भिगोकर
हर बार तुमसे जोड़ जाती है।
ना कोई मंत्र हो,
ना कोई विधि हो,
हर बार तुम्हारे नाम के साथ
मेरे नाम का जिक्र हो।
जिंदगी के पड़ाव पर,
जिंदगी के इम्तिहान में,
अक्सर प्रेम की धाराओं का
मिलना ही प्रेम कहलाता है


